Posts

Showing posts from April, 2020

बौद्ध धर्म में उत्तम व्यक्ति की व्याख्या (Anaṅgaṇa Sutta)

Image
नमो बुद्धाय! सभी उपासक एवं उपसिकाओं को मेरा नमस्कार। दोस्तों! बौद्ध धम्म के अनुसार इस लोक (संसार) में चार तरह (प्रकार) के व्यक्ति होते हैं। कौन से चार? पहला, वह व्यक्ति होता है जो अपने चित्त में मल सहित होता हुआ भी यह ठीक से नहीं जानता कि उसके चित्त में मल ( राग, द्वेष, मोह , ये तीन प्रकार के चित्तमल अथवा अंगण) है। दूसरा, वह व्यक्ति होता है, जो अपने चित्त में मल होने पर जानता है कि उसके चित्त में मल है। तीसरा, वह व्यक्ति होता है, जिसका चित्त निर्मल होता है पर वह नहीं जानता कि वह निर्मल चित्त वाला है। चौथा, वह व्यक्ति है, जिसका चित्त निर्मल होता है और वह यह बात अच्छी तरह से जानता है कि उसका चित्त पूर्णतः निर्मल है। इन चारों तरह के व्यक्तियों में पहले दो व्यक्तियों जिनके चित्त में मल है, में से जो व्यक्ति यह ठीक से नहीं जानता कि उसके चित्त में मल है वह उन दोनों तरह के व्यक्तियों में हीन माना जाता है, क्योंकि जब उसे ठीक से पता ही न होगा कि उसके चित्त में मल है तो वह अपने चित्त को परिशुद्ध करने का कोई प्रयास ही नहीं करेगा और ऐसे में वह राग-युक्त, द्वेष युक्त और मोह ...

बुद्ध के मूल सिद्धांत

Image
नमो बुद्धाय ! बुद्ध के उपदेशों को समझने के पूर्व निम्न लिखित चार मूल सिद्धांतों को जानना अत्यंत आवश्यक है। इन चार मूल सिद्धांतों में तीन स्वीकारात्मक एवं एक अस्वीकारात्मक हैं, ये सिद्धांत हैं -  ईश्वर को न मानना (अनिश्ववाद); "मनुष्य स्वयं अपना मालिक है" - इस सिद्धांत का विरोध होगा (अस्वीकारात्मक सिद्धांत)। आत्मा को नित्य नहीं मानना; अन्यथा नित्य एक रस मानने पर उसकी परिशुद्धि और मुक्ति के लिए गुंजाइश नहीं रहेगी। किसी ग्रंथ को स्वतः प्रमाण नहीं मानना; अन्यथा बुद्धि और अनुभव की प्रामाणिकता जाती रहेगी। जीवन - प्रवाह को इसी शरीर तक परिमित न मानना; अन्यथा जीवन और उसकी विचित्रताएं कार्य- कारण नियम से उत्पन्न न होकर सिर्फ आकस्मिक घटनाएं रह जाएंगी। बौद्ध धर्म (धम्म) में इस चार सिद्धांत सर्वमान्य हैं। बुद्ध की शिक्षा और दर्शन इन चार सिद्धांतों पर अवलंबित है। पहले तीनों सिद्धांत बौद्ध धर्म को दुनिया के अन्य धर्मों से पृथक करते हैं। ये तीनों सिद्धांत जड़वाद और बुद्ध धम्म में समान हैं। किंतु चौथी बात, अर्थात जीवन - प्रवाह को इसी शरीर तक परिसीमित न मानना, इसे भौतिकवाद यानी जड़त्व से पृथक करत...