बुद्ध के मूल सिद्धांत
नमो बुद्धाय !
बुद्ध के उपदेशों को समझने के पूर्व निम्न लिखित चार मूल सिद्धांतों को जानना अत्यंत आवश्यक है। इन चार मूल सिद्धांतों में तीन स्वीकारात्मक एवं एक अस्वीकारात्मक हैं, ये सिद्धांत हैं -
- ईश्वर को न मानना (अनिश्ववाद); "मनुष्य स्वयं अपना मालिक है" - इस सिद्धांत का विरोध होगा (अस्वीकारात्मक सिद्धांत)।
- आत्मा को नित्य नहीं मानना; अन्यथा नित्य एक रस मानने पर उसकी परिशुद्धि और मुक्ति के लिए गुंजाइश नहीं रहेगी।
- किसी ग्रंथ को स्वतः प्रमाण नहीं मानना; अन्यथा बुद्धि और अनुभव की प्रामाणिकता जाती रहेगी।
- जीवन - प्रवाह को इसी शरीर तक परिमित न मानना; अन्यथा जीवन और उसकी विचित्रताएं कार्य- कारण नियम से उत्पन्न न होकर सिर्फ आकस्मिक घटनाएं रह जाएंगी।
बौद्ध धर्म (धम्म) में इस चार सिद्धांत सर्वमान्य हैं। बुद्ध की शिक्षा और दर्शन इन चार सिद्धांतों पर अवलंबित है। पहले तीनों सिद्धांत बौद्ध धर्म को दुनिया के अन्य धर्मों से पृथक करते हैं। ये तीनों सिद्धांत जड़वाद और बुद्ध धम्म में समान हैं। किंतु चौथी बात, अर्थात जीवन - प्रवाह को इसी शरीर तक परिसीमित न मानना, इसे भौतिकवाद यानी जड़त्व से पृथक करता है और साथ ही व्यक्ति के लिए भविष्य को आशामय बनाने का यह सुंदर उपाय है जिसके बिना किसी आदर्शवाद का कार्यरूप में परिणत होना दुष्कर है।
चारो सिद्धांतों में पहले तीन, बड़ी परतंत्रताओं से मनुष्य को मुक्त करते हैं। चौथा सिद्धांत आशामय भविष्य का संदेश देता है और शील - सदाचार के लिए नींव बनाता है। चारों का जिसमें एकत्र सम्मेलन है वही बुद्ध धम्म है।
भवतु सब्ब मंगलं
(संदर्भ: यह लेख त्रिपिटक ग्रंथ माला के मज्झिम निकाय (महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा अनुवादित) की भूमिका से लिया गया है।)

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