मिलिन्द प्रश्न (प्रस्तावना भाग 1)



नमो बुद्धाय!

बौद्ध ग्रंथों में "मिलिन्द प्रश्न" नामक ग्रंथ अपना एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चूँकि "मिलिन्द प्रश्न ग्रंथ की गिनती त्रिपिटक के ग्रंथों में नहीं की जाती, परंतु त्रिपिटक के बाद लिखे जाने वाले बौद्ध ग्रंथों में इसकी महत्वता को कम नहीं समझा जा सकता। जिस प्रकार हिन्दू धर्म के ग्रंथों में श्रीमद्भागवत गीता का एक अतुल्य स्थान है और गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन की विभिन्न शंकाओं का समाधान करने के लिए उपदेशात्मक उत्तर दिए हैं उसी तरह मिलिन्द प्रश्न में सम्राट मिलिन्द (मिनांडर) के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का, शंकाओं का समाधान भिक्खु नागसेन के द्वारा किया गया है।

ईसा से 326 वर्ष पूर्व यूनानी सम्राट सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था, परंतु उसकी सेना मगध की विशाल सेना का सामना न कर पायी और उसे वापस लौटना पड़ा। सिकंदर के कुछ साथी पश्चिमी एशिया में बस गए, और इस प्रकार भारत में यूनानियों का आकर बस जाना जारी रहा। ईसा से 150 वर्ष पूर्व भारत के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में सागल या शाकल नामक देश था, जिस पर यूनानी राजा मिनांडर का शासन था। मिनांडर एक यूनानी नाम है जिसका हिंदी या भारतीय नाम मिलिन्द है। उस काल में यूनान में दर्शनिकवाद का बहुत प्रचलन था, जिस कारण से हम इतिहास के बड़े दार्शनिको में यूनान के सोक्रेट्स (सुकरात), प्लेटो, एरिस्टोटल (अरस्तु) इत्यादि के नाम अक्सर पढ़ते हैं। यूनानी होने के कारण मिनांडर भी दार्शनिक परम्परा से पूरी तरह प्रभावित रहे, और इसी कारण वे एक श्रेष्ठ राजा होने के साथ साथ एक प्रतिभावान दार्शनिक, तर्क शास्त्र में प्रवीण, न्यायशास्त्र में अग्रणी एवं शास्रार्थ में भी श्रेष्ठ थे। शास्रार्थ करते वक़्त वे अपने समक्ष विपक्षी को 1-2 प्रश्नों में ही हरा दिया करते थे। इसी कारण मिनांडर अपने राज्य का विस्तार करने और यहाँ के तत्कालीन प्रसिद्ध साधु-संतों, विद्वानों के साथ वाढ-विवाद एवं शास्रार्थ करके अपनी ज्ञान पिपासा की तृप्ति का संकल्प लेकर भारत आया। और वह भारत के विद्वानों को ललकारता था कि "यह जम्बूद्वीप तो तुच्छ है, यहाँ के पंडित ज्ञान की दृष्टि से कोरे और नामधारी हैं। झूठा ही इसका इतना नाम हुआ है, यहां मेरे साथ शास्रार्थ करने और मेरी शंकाओं को मिटाने वाला कोई भी नहीं है।"

और इसी विचार से वह जहाँ कहीं भी कोई ब्राह्मण या विद्वान मिलता, उनसे शास्रार्थ करने चला जाता। पर अपनी चतुराई के कारण उसे कोई भी न मिलता जो उसकी शंकाओं का समाधान कर सके।

राजा मिलिन्द के प्रश्नों एवं शंकाओं के समाधान के लिए बौद्ध भिक्खु नागसेन ने उसकी चुनौती को स्वीकारा और अंततः मिनांडर न सिर्फ संतुष्ट हुआ बल्कि उसने बौद्ध धम्म को स्वीकार भी किया।

आगे के अध्यायों में आप पढ़ेंगे कि मिलिन्द प्रश्न किताब को कितने भागों में बांटा गया, मिनांडर के पूर्व जन्म की कथा और भी बहुत कुछ।

भवतु सब्ब मंगलं।

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