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"आत्मा" अमर है.. अनात्मवाद की दृष्टि से एक विश्लेषणात्मक चिंतन

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"आत्मा" अमर है.. अनात्मवाद की दृष्टि से एक विश्लेषणात्मक चिंतन.. ये जो "मैं" है, मुझमें है, तुम में है, और हम सभी में है "अलग - अलग", पर एक ही है। और अगर आप विचार करो, चिंतन या मनन करो तो पाओगे कि ये जो "मैं" है, वो अजन्मा है वो कब मुझमें जन्मा, मुझे भी नहीं पता वो कब तुम में जन्मा, तुम्हे भी नहीं पता। पर ये मुझमें मेरे जन्म के साथ है, शायद जन्म से पहले भी था और शायद मृत्यु के बाद भी। इस "मैं" कि मृत्यु नहीं हो सकती, क्योंकि मेरे या तुम्हारे शरीर की मृत्यु के बाद भी ये मैं, किसी न किसी शरीर में जीवित ही रहेगा। ये मर नहीं सकता, ये अमर है। और इसीलिए मैं कहता हूं कि ये "मैं" ही "आत्मा" है।  ये जो मेरा वजूद है, मेरे शरीर तक ही है, पर मेरे "मैं" का वजूद, मेरे शरीर के बाद किसी न किसी अन्य रूप में, किसी न किसी अन्य शरीर में ज़िंदा रहेगा।  मेरे "मैं" को मैं भी तब तक नहीं मार सकता, जब तक मैं इस "मैं" का अस्तित्व ही झुठला न दूँ, जब तक इस "मैं" को मानना ही न छोड़ दूं। तथागत बुद्ध ने भी यही ...