"आत्मा" अमर है.. अनात्मवाद की दृष्टि से एक विश्लेषणात्मक चिंतन

"आत्मा" अमर है.. अनात्मवाद की दृष्टि से एक विश्लेषणात्मक चिंतन..


ये जो "मैं" है, मुझमें है, तुम में है, और हम सभी में है

"अलग - अलग", पर एक ही है।

और अगर आप विचार करो, चिंतन या मनन करो तो पाओगे

कि ये जो "मैं" है,

वो अजन्मा है

वो कब मुझमें जन्मा, मुझे भी नहीं पता

वो कब तुम में जन्मा, तुम्हे भी नहीं पता।

पर ये मुझमें मेरे जन्म के साथ है,

शायद जन्म से पहले भी था

और शायद मृत्यु के बाद भी।

इस "मैं" कि मृत्यु नहीं हो सकती, क्योंकि मेरे या तुम्हारे शरीर की मृत्यु के बाद भी ये मैं, किसी न किसी शरीर में जीवित ही रहेगा। ये मर नहीं सकता, ये अमर है।

और इसीलिए मैं कहता हूं कि ये "मैं" ही "आत्मा" है। 

ये जो मेरा वजूद है, मेरे शरीर तक ही है, पर मेरे "मैं" का वजूद, मेरे शरीर के बाद किसी न किसी अन्य रूप में, किसी न किसी अन्य शरीर में ज़िंदा रहेगा। 

मेरे "मैं" को मैं भी तब तक नहीं मार सकता,

जब तक मैं इस "मैं" का अस्तित्व ही झुठला न दूँ, जब तक इस "मैं" को मानना ही न छोड़ दूं।

तथागत बुद्ध ने भी यही किया था, उन्होंने आत्मा मतलब अपने "मैं" को मानने से इनकार कर दिया था। और ऐसा करते ही जो नया व्यक्तित्व उन्होंने अपने सामने पाया, उसे उन्होंने "बुद्ध" कहा। उन्होंने अपने उपदेशों में बुद्ध की चर्चा की है, न कि स्वयं की। उन्होंने अपने शरण में आये व्यक्ति को बुद्ध की शरण में जाने को कहा है, बुद्ध की बात सुनने और मानने को कहा है, ये कभी नहीं कहा कि मैं बुद्ध हूँ, इसीलिए मेरी शरण में आओ, मेरी बात सुनो और मानो।

एक कारण और है बुद्ध के अनात्मवादी होने का, वो यह कि बुद्ध ने पाया कि प्रत्येक चीज परिवर्तनशील है, और परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। हम हर क्षण, हर सेकेंड या समय की उससे भी छोटी इकाई में परिवर्तित हो रहे हैं। हमारे शरीर में प्रत्येक क्षण कोशिकाएं बन रही हैं और मिट भी रही हैं। और एक समय अंतराल में पूर्ण शरीर नया हो रहा है। तो जिस शरीर को हम अपना कहते हैं, वह तो हर पल परिवर्तित होते जा रहा है। ऐसी स्थिति में शरीर के अंदर 1 घंटे पूर्व कहा गया "मैं", तो अब रहा ही नहीं। अब वह भी एक नया "मैं" बन चुका है। ऐसे में मेरा "मैं" या मेरी आत्मा कैसे कह सकते हैं कि निश्चित रह सकती है। और आत्मवाद के अनुसार आत्मा निश्चित है। जबकि प्रकृति के नियम अनुसार कोई भी चीज निश्चित नहीं हो सकती। इसी कारण से बुद्ध ने आत्मा को स्वीकार नहीं किया।

अंततः मेरा मानना है कि ये जो "मैं" है या आत्मा है, ये सिर्फ एक वहम है, एक विरोधाभास है कि ये अजन्मा है, और अमर है क्योंकि ये हमारे जन्म के पश्चात हमारी सोच समझ बढ़ने के साथ साथ इस "मैं" का जन्म अविद्या के कारण हमारे चेतन - अवचेतन मन में हो जाता है। और  जीवन पर्यंत ये अविद्या की धारणा अर्थात "मैं" अस्तित्व में रहता है। इसी अविद्या के कारण हमें एक धारणा और हो जाती है कि ये "मैं" हमारे जीवन के बाद भी रहेगा, और फिर किसी अन्य शरीर के नए जन्म के साथ उसे धारण करूँगा। यही मिथ्यादृष्टि हमें ये मानने पर मजबूर कर देती है कि इसके पूर्व भी "मैं" किसी अन्य शरीर में जीवित था।

अतः हमें चाहिए कि पहले अपनी इस मिथ्या दृष्टि को समाप्त करते हुए इस परिवर्तनशील प्रकृति के सबसे शक्तिशाली नियम पर चिंतन और मनन करने का प्रयत्न करें। 

इस लेख को पढ़ने के बाद भी आपके मन में कुछ दुविधा भरे सवाल उपज रहे होंगे, जैसे कि यदि "मैं" या आत्मा नहीं होती तो फिर ये पुनर्जन्म से संबंधित बातें है, और कर्मों का फल आगामी जन्मों में भुगतने संबंधी बातें हैं वो क्या और क्यों हैं.., तो उस बारे में हम बात करेंगे। मगर पहले अपने मन में एक परिवर्तन की नई लहर पैदा करने के बाद।


🙏 नमो बुद्धाय.. 🙏

🙏 सबका मंगल हो.. 🙏

Comments

Popular posts from this blog

मिलिन्द प्रश्न : भन्ते नागसेन का जन्म

मिलिन्द प्रश्न : राजा मिलिन्द की भेंट

बौद्ध धम्म में प्रचलित अति महत्वपूर्ण बातें (Important and essential things in Buddhism)