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मिलिन्द प्रश्न : बालक नागसेन और आयुष्मान रोहण की भेंट

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नमो बुद्धाय! बालक नागसेन अपनी शिक्षा को ध्यान अवस्था में विचारने लगे, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि न आदि में, न माध्यम में और न ही अवसान में इस शिक्षा का कोई भी सार नहीं है, जिससे उसे बहुत असंतुष्टि हुई। तब उस के मन में आया कि "ये वेद तुच्छ हैं, खोखले हैं। उनमें न कोई सार है न कोई अर्थ है और न कोई तथ्य है।" तब अपने ध्यान बल से आयुष्मान रोहण को बालक नागसेन के  चित्त को जान कर आयुष्मान रोहण बालक नागसेन जहाँ थे उस गांव में पहुँचे। बालक नागसेन ने अपने घर के दरवाजे पर खड़े-खड़े आयुष्मान रोहण को दूर ही से आते देखा । उन्हें देख कर वह बहुत संतुष्ट, प्रमुदित और प्रीतियुक्त हो उठा। यह विचार कर कि शायद यह भिक्षु कुछ सार जानता होगा, वह उनके पास गया और बोला--"मारिस ! इस तरह सिर मुड़ाये और काषाय वस्त्र धारण किये आप कौन हें ?” "बालक! मैं भिक्षु हूँ" "मारिस! आप भिक्षु क्यों बने?" "पापरूपी मलों को दूर करने के लिये मैं भिक्षु हुआ हूँ।" "मारिस! क्‍या कारण है कि आप के केश वैसे नहीं हैं, जैसे दूसरे लोगों के होते हैं?" "उनमें सोलह बाधायें देखकर, भिक्षु सि...