मिलिन्द प्रश्न : बालक नागसेन और आयुष्मान रोहण की भेंट

नमो बुद्धाय!
बालक नागसेन अपनी शिक्षा को ध्यान अवस्था में विचारने लगे, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि न आदि में, न माध्यम में और न ही अवसान में इस शिक्षा का कोई भी सार नहीं है, जिससे उसे बहुत असंतुष्टि हुई। तब उस के मन में आया कि "ये वेद तुच्छ हैं, खोखले हैं। उनमें न कोई सार है न कोई अर्थ है और न कोई तथ्य है।"
तब अपने ध्यान बल से आयुष्मान रोहण को बालक नागसेन के चित्त को जान कर आयुष्मान रोहण बालक नागसेन जहाँ थे उस गांव में पहुँचे।
बालक नागसेन ने अपने घर के दरवाजे पर खड़े-खड़े आयुष्मान रोहण को दूर ही से आते देखा । उन्हें देख कर वह बहुत संतुष्ट, प्रमुदित और प्रीतियुक्त हो उठा। यह विचार कर कि शायद यह भिक्षु कुछ सार जानता होगा, वह उनके पास गया और बोला--"मारिस ! इस तरह सिर मुड़ाये और काषाय वस्त्र धारण किये आप कौन हें ?”
"बालक! मैं भिक्षु हूँ"
"मारिस! आप भिक्षु क्यों बने?"
"पापरूपी मलों को दूर करने के लिये मैं भिक्षु हुआ हूँ।"
"मारिस! क्या कारण है कि आप के केश वैसे नहीं हैं, जैसे दूसरे लोगों के होते हैं?"
"उनमें सोलह बाधायें देखकर, भिक्षु सिर और दाढ़ी मुड़वा लेता है।"
"कौन सी सोलह बाधाएं हैं? कृपया विस्तार से बतायें।"
"केश और दाढ़ी रखने से उसे
(१) सँवारना होता है,
(२) सजाना होता है,
(३) तेल लगाना पड़ता है,
(४) धोना होता है,
(५) माला पहनना होता है,
(६) गन्ध लगाना होता है,
(७) सुगंधित रखना होता है,
(८) हर्रे का व्यवहार करना होता हैं,
(९) आँवले का व्यवहार करना होता है,
(१०) रंगना होता है,
(११) बाँधना होता है,
(१२) कंघी फेरना होता है,
(१३) बार - बार नाई को बुलाना पड़ता है,
(१४) जटों को सुलझाना होता है,
(१५) जूं पड़ जाती है, और
(१६) जब केश झड़ते लगते हैं तो लोग चिन्तित होते हैं, दुखी होते हैं, अफसोस करते हैं, छाती पीट - पीट कर रोते हैं और मोह को प्राप्त होते हैं।
बालक! इन सोलह बाधाओं की वजह से मनुष्य अत्यन्त सूक्ष्म बातों को भूल जाते हैं।"
"मारिस ! क्या कारण हैं कि आपके वस्त्र भी वैसे नहीं हैं, जैसे दूसरों के होते हैं ?"
"बालक! गृहस्थों के सुन्दर वस्त्रों में कामवासनायें लगी रहती हैं।
वस्त्र के कारण जिस भय के होने की सम्भावना है, वह काषाय वस्त्र पहनने वाले को नहीं होता। इसीलिये मेरे वस्त्र भी वैसे नहीं हैं जैसे दूसरों के होते हैं।"
"मारिस ! क्या आप ज्ञान की बातें जानते हैं?"
"हाँ बालक!, मैं यथार्थ ज्ञान को जानता हूँ और जो संसार में सबसे उत्तम मन्त्र है, उसे भी जानता हूँ।"
"मारिस! क्या मुझे भी सिखा सकते हैं?"
"हाँ, सिखा सकता हूँ।"
"मैं सीखना चाहता हूँ, कृपया मुझे सिखाइये।"
"बालक ! उसके लिये यह उचित समय नहीं है। अभी मैं गाँव में भिक्षाटन के लिये आया हूँ। जब तुम सभी बाधाओं से रहित हो, अपने माता-पिता से अनुमति प्राप्त कर भिक्खु वेश को धारण कर लोगे, तब मैं तुम्हें सिखाऊँगा।"
तब बालक नागसेन ने अपने माता-पिता से प्रव्रज्या ग्रहण करने एवं ज्ञान प्राप्ति हेतु संसार के सबसे उत्तम मंत्र को सीखने की अनुमति माँगी, तब नागसेन के माता-पिता ने यह सोचा कि हमारा पुत्र प्रव्रजित होकर मंत्र सीखने के बाद वापिस लौट आएगा इसीलिए उन्होंने उसे सहर्ष अनुमति प्रदान कर दी।
नागसेन की प्रव्रज्या
तब आयुष्मान् रोहण नागसेन को ले वत्तनीय आश्रम के लिए विजम्भवत्थु को गये। विजम्भवत्थु में एक रात रह जहाँ हिमालय का रक्षित-तल था, वहाँ गये। जाकर कोटिशत अर्हतों के बीच नागसेन को प्रव्रजित किया।
प्रव्रज्या ले लेने के बाद आयुष्मान नागसेन ने आयुष्मान रोहण से कहा, "भन्ते! मैंने आप का वेश धारण कर लिया। अब मुझे मन्त्र सिखाइये।”
तब आयुष्मान् रोहण विचारने लगे,"इसे पहले क्या पढ़ाऊँ, सूत्र या अभिधर्म ?” फिर यह सोच कर कि नागसेन पण्डित (विद्वान) है, आसानी से अभिधर्म समझ लेगा, पहले अभिधर्म ही पढ़ाया।
आयुष्मान रोहण ने आयुष्मान नागसेन को अभिधर्मपिटक से संबंधित सभी सातों पुस्तकें पढ़ायीं, सातों अभिधर्म पुस्तकों को नागसेन श्रामणेर ने शीघ्र ही पढ़ कर, समझ कर कण्ठस्थ भी कर लिया। फिर नागसेन ने कहा, “भन्ते ! बस करें ! इतने ही से मैं आप को सब सुना सकता हूँ।"
तब, आयुष्मान् नागसेन ने जहाँ कोटिशत अर्हत थे, वहाँ जाकर उनसे अभिधर्मपिटक की व्याख्या, "कुशल धर्म, अकुशल धर्म और अव्याकृत धर्म" इन तीन विषयों में केंद्रित करते हुए की। उक्त सातों तरह की पुस्तकों की विस्तारपूर्वक व्याख्या करने में नागसेन को सात माह लगे।
व्याख्या पूर्ण होने के बाद सभी भिक्खुओं के द्वारा करतल ध्वनि से नागसेन श्रामणेर का अभिवादन किया और सभी ने साधुवाद किया।
अगले भाग में बालक नागसेन को आयुष्मान रोहण द्वारा दण्डकर्म दिए जाने एवं अन्य प्रसंगों के बारे में विस्तार से बताया जाएगा। कृपया अपने स्नेह बनाये रखें और लेखन की सराहना कमेंट के रूप में जरूर करें।
भवतु सब्ब मंगलं।
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