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मिलिन्द प्रश्न : बालक नागसेन और आयुष्मान रोहण की भेंट

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नमो बुद्धाय! बालक नागसेन अपनी शिक्षा को ध्यान अवस्था में विचारने लगे, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि न आदि में, न माध्यम में और न ही अवसान में इस शिक्षा का कोई भी सार नहीं है, जिससे उसे बहुत असंतुष्टि हुई। तब उस के मन में आया कि "ये वेद तुच्छ हैं, खोखले हैं। उनमें न कोई सार है न कोई अर्थ है और न कोई तथ्य है।" तब अपने ध्यान बल से आयुष्मान रोहण को बालक नागसेन के  चित्त को जान कर आयुष्मान रोहण बालक नागसेन जहाँ थे उस गांव में पहुँचे। बालक नागसेन ने अपने घर के दरवाजे पर खड़े-खड़े आयुष्मान रोहण को दूर ही से आते देखा । उन्हें देख कर वह बहुत संतुष्ट, प्रमुदित और प्रीतियुक्त हो उठा। यह विचार कर कि शायद यह भिक्षु कुछ सार जानता होगा, वह उनके पास गया और बोला--"मारिस ! इस तरह सिर मुड़ाये और काषाय वस्त्र धारण किये आप कौन हें ?” "बालक! मैं भिक्षु हूँ" "मारिस! आप भिक्षु क्यों बने?" "पापरूपी मलों को दूर करने के लिये मैं भिक्षु हुआ हूँ।" "मारिस! क्‍या कारण है कि आप के केश वैसे नहीं हैं, जैसे दूसरे लोगों के होते हैं?" "उनमें सोलह बाधायें देखकर, भिक्षु सि...

मिलिन्द प्रश्न : भन्ते नागसेन का जन्म

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नमो बुद्धाय! पिछले अध्याय में हमने पढ़ा था कि देवपुत्र महासेन को आयुष्मान अस्सगुत्त और अन्य देवताओं एवं भिक्खुओं के द्वारा मनुष्य लोक में जन्म हेतु आग्रह किया गया और भिक्खु संघ की बैठक में शामिल न होने पर आयुष्मान रोहण को बालक नागसेन की प्रव्रज्या तक के लिए दण्ड कर्म का आदेश दिया गया था।  फिर आयुष्मान रोहण दण्ड कर्म आदेश अनुसार हिमालय पर्वत के पास के कजंगल गांव में गए और दण्ड कर्म अनुसार प्रतिदिन सोनुत्तर ब्राम्हण के घर पर  भिक्षाटन के लिए जाने लगे। शुरुआत में कई वर्षों तक उन्हें ब्राम्हण के घर से कोई भिक्षाटन प्राप्त नहीं हुआ और न ही किसी ने "आगे जाओ" ऐसे शब्द कह कर उन्हें बोला।  दस माह बीतने पर ब्राम्हण के घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम नागसेन रखा गया। धीरे - धीरे वह बालक 7 वर्ष का हो गया। तब उसके पिता ने उसे कहा, " प्रिय नागसेन! इस ब्राम्हण कुल की जो शिक्षाएं हैं तुम्हें उन्हें सीखना चाहिए।" बालक नागसेन ने कहा, "तात! इस ब्राम्हण कुल की कौन सी शिक्षाएं हैं?" "प्रिय नागसेन! तीनों वेद और दूसरे शिल्प - ये ही शिक्षाएं हैं।" "तात! मैं सभी शि...

मिलिन्द प्रश्न : राजा मिलिन्द की भेंट

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  नमो बुद्धाय! मित्रों! पिछले भाग में हमने राजा मिलिन्द और भन्ते नागसेन के पूर्व जन्म की गाथा को पढ़ा था। अब हम राजा मिलिन्द, जो कि विद्या व्यसनी था और अपनी ज्ञान पिपासा को मिटाने हेतु हमेशा आतुर रहता था, की तत्कालीन विद्वान व्यक्तियों से भेंट की गाथा सुनेंगे। कहा जाता है कि राजा मिलिन्द के पास अनंत सेना थी, अतः एक दिन राजा मिलिन्द अपनी चतुरंगिणी अनन्त सेना को देखने के अभिप्राय से नगर के बाहर गया। सेनाओं की गणना करने के बाद उस वाद-प्रिय राजा ने लोकायत और वितण्डवादियों (इनके मतानुसार स्वर्ग और नर्क कुछ नहीं होता है, ये पूर्णतः यथार्थवादी थे, ये संसार को ही सब कुछ मानते थे। इनके किसी भी बात का प्रत्यक्ष प्रमाण ही एक मात्र प्रमाण होता था) से तर्क करने की उत्सुकता से ऊपर सूर्य की ओर देखा, और अपने अमात्यों (मंत्रियों) को सम्बोधित किया- "अभी बहुत दिन बाकी है। तब तक क्‍या करना चाहिये?क्‍या ऐसा कोई पण्डित सम्यक्‌ - सम्बुद्ध के सिद्धान्तों को जानने वाला श्रमण, ब्राह्मण या गणाचार्य है, जिसके साथ में नगर में जाकर वार्तालाप करूँ, जो मेरी शंकाओं को दूर कर सके ?” राजा के द्वारा ऐसा कहने पर पाँच ...