मिलिन्द प्रश्न : राजा मिलिन्द की भेंट
नमो बुद्धाय!
मित्रों! पिछले भाग में हमने राजा मिलिन्द और भन्ते नागसेन के पूर्व जन्म की गाथा को पढ़ा था। अब हम राजा मिलिन्द, जो कि विद्या व्यसनी था और अपनी ज्ञान पिपासा को मिटाने हेतु हमेशा आतुर रहता था, की तत्कालीन विद्वान व्यक्तियों से भेंट की गाथा सुनेंगे।
कहा जाता है कि राजा मिलिन्द के पास अनंत सेना थी, अतः एक दिन राजा मिलिन्द अपनी चतुरंगिणी अनन्त सेना को देखने के अभिप्राय से नगर के बाहर गया। सेनाओं की गणना करने के बाद उस वाद-प्रिय राजा ने लोकायत और वितण्डवादियों (इनके मतानुसार स्वर्ग और नर्क कुछ नहीं होता है, ये पूर्णतः यथार्थवादी थे, ये संसार को ही सब कुछ मानते थे। इनके किसी भी बात का प्रत्यक्ष प्रमाण ही एक मात्र प्रमाण होता था) से तर्क करने की उत्सुकता से ऊपर सूर्य की ओर देखा, और अपने अमात्यों (मंत्रियों) को सम्बोधित किया- "अभी बहुत दिन बाकी है। तब तक क्या करना चाहिये?क्या ऐसा कोई पण्डित सम्यक् - सम्बुद्ध के सिद्धान्तों को जानने वाला श्रमण, ब्राह्मण या गणाचार्य है, जिसके साथ में नगर में जाकर वार्तालाप करूँ, जो मेरी शंकाओं को दूर कर सके ?”
राजा के द्वारा ऐसा कहने पर पाँच सौ यवनों ने उससे कहा- "हाँ! महाराज, ऐसे छ: पण्डित हैं--
(१) पुरण कस्सप,
(२) मक्खली गोसाल
(३) निगण्ठ नातपुत्त,
(४) सञ्जय वेलट्ठिपुत्त,
(५) अजित केसकम्बली और
(६) ककुध कच्चान।
वे संघ-नायक, गणनायक, गणाचार्य, प्रज्ञावान और तीर्थंकर हैं। लोगों में उनका बड़ा सम्मान है। महाराज ! आप को उनके पास जाना चाहिए और अपनी शंकाओं को दूर करना चाहिए।"
पूरण कस्सप के साथ राजा मिलिन्द की भेंट
तब राजा मिलिन्द पाँच सौ यवनों के साथ सुन्दर रथ पर सवार हो, जहाँ पूरण कस्सप था वहाँ गया और पूरण कस्सप के साथ कुशल प्रश्न पूछा। कुशल प्रश्न पूछते के बाद एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठ कर वह पुरण कस्सप से यह बोला "भन्ते कस्सप! संसार का कौन पालन करता है?"
"महाराज ! पृथ्वी संसार का पालन करती है।"
"भन्ते कस्सप! यदि पृथ्वी संसार का पालन करती है, तो अविचि नरक में जाने वाले जीव पृथ्वी का अतिक्रमण कर के क्यों जाते हैं ? (अविचि नरक पाताल की ओर जहाँ सौ योजन के घेरे में कड़ी आग धधक रही है, उस ओर बतलाया गया है।)
राजा के ऐसा कहते ही पूरण कस्सप एकदम चुप हो गया, वह राजा के सवाल का जवाब नही दे पाया और कंधों को गिराकर चुपचाप हतबुद्धि हो बैठा रहा। फिर राजा समझ गया कि इसके आगे उसके प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं मिलने वाला अतः वह वहाँ से चला गया।
मक्खली गोसाल के साथ राजा मिलिन्द की भेंट
इसके बाद राजा मिलिन्द मक्खली गोसाल के पास गया और वहां उसने मक्खली गोसाल से पूछा, “भन्ते गोसाल ! क्या पाप और पुण्य कर्म होते हैं ? क्या अच्छे और बुरे कर्मों के फल भोगने पड़ते हैं ?"
"नहीं महाराज ! पाप और पुण्य कर्म कुछ नहीं हैँ। अच्छे और बुरे कर्मों के कोई फल भोगने नहीं पड़ते हैं। महाराज ! जो यहाँ क्षत्रिय हैं वे परलोक जा कर भी क्षत्रिय ही होंगे; जो यहाँ ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, चण्डाल या पुक्कुस हैं वे परलोक में जा कर भी ब्राह्मण, वेश्य, शूद्र, चण्डाल और पुक्कुस ही होंगे। पाप और पुण्य कर्मों से क्या होता है ?", गोसाल ने उत्तर दिया।
(पुक्कुस जाति तत्समय कोई निचली जाति समझी जाती रही होगी, जिस के बारे में ज्यादा जानकारी मूल मिलिन्द प्रश्न ग्रंथ में नहीं दी गई है।)
"भन्ते गोसाल ! यदि जो यहाँ क्षत्रिय हैं, वे परलोक जा कर भी क्षत्रिय ही होंगे और पाप पुण्य कर्मो से कुछ होना-जाना नहीं है, तो जो इस लोक में लूले हैं, वे परलोक जा कर भी लूले ही होंगे, जो लंगड़े हैं, वे लंगड़े ही होंगे, जो कनकटे और नकटे हैं, वे कनकटे और नकटे ही होंगे।
राजा के ऐसा कहने पर गोसाल चुप हो गया और राजा के सवाल का जवाब न दे सका।
तब, राजा मिलिन्द के मन में ऐसा आया कि “अरे! जम्बूद्वीप तुच्छ है ! झूठ-मूठ का इतना नाम है इसका। यहाँ कोई भी श्रमण या ब्राह्मण नहीं है, जो मेरे साथ बातचीत कर सके और मेरी शंकाओं को दूर करे। यहाँ के पण्डित ज्ञान की दृष्टि से कोरे और केवल नामधारी हैं, यहाँ किसी को कोई भी ज्ञान नहीं है।”
और फिर राजा वहाँ से भी वापस अपने नगर लौट गया।
एक दिन राजा मिलिन्द ने अमात्यों को सम्बोधित किया- “आज की रात बड़ी रमणीय है! किस श्रमण या ब्राह्मण के पास जा कर प्रश्न पूछूँ ? कौन मेरे साथ बातचीत कर सकता है; कौन मेरी शंकाओं को दूर करेगा?”
ऐसा सुनते ही सारे मंत्रीगण और सेवक चुपचाप हो गए और राजा के मुख की ओर देखते रह गये। किसी भी के पास राजा के इन सवालों का कोई भी जवाब नहीं था। क्योंकि उस समय 12 वर्षों से सागल नगर ब्राम्हण, पण्डित और श्रमणों से खाली हो गया था।
जहाँ राजा जहाँ कहीं भी सुनता कि कोई श्रमण, ब्राम्हण या गृहस्थ पण्डित वास करता है, वह वहाँ जा कर उससे प्रश्न पूछता। वे राजा को प्रशनोत्तर से संतुष्ट न कर सकने पर जहाँ - तहाँ चले जाते थे। जो किसी दूसरी जगह नहीं जाते थे, वे सभी मौन व्रत ले लेते थे। प्रायः सभी भिक्खु हिमालय पर्वत पर चले गये थे। उस समय हिमालय परत के तलहटी में हजारो - लाखों अर्हत वास करते थे।
इस प्रकार राजा मिलिन्द ने अपने राज्य के समस्त ज्ञानी और विद्वानों को राज्य छोड़ कर जहाँ-तहाँ वास करने हेतु मजबूर कर दिया था। पर फिर भी राजा की ज्ञान की प्यास नहीं बुझी थी। वो हरदम हमेशा ही अपनी शंकाओं का समाधान ढूंढने का प्रयास करता रहता था।
नोट: इस श्रृंखला में स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक जैसे शब्दों का बार-बार प्रयोग आता रहेगा, इसलिए कृपया विचलित न हों, बौद्ध धम्म हमारे देश के लगभग हर धर्म और संस्कृति की नींव है अतः इसे जितना जानेंगे उतना इन बातों को भी मानना पड़ेगा और स्वर्ग-नरक और उनके अलग अलग प्रकार के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए आपको त्रिपिटक ग्रंथों को पढ़ना होगा।
अगले भाग में भन्ते नागसेन के जन्म, उनकी शिक्षा एवं दीक्षा इत्यादि के संबंध में विस्तार से बताया जाएगा। कृपया अपने स्नेह बनाये रखें और लेखन की सराहना कमेंट के रूप में जरूर करें।
भवतु सब्ब मंगलं।
(Photo Credit : Facebook.com)

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