मिलिन्द प्रश्न : पूर्व योग


नमो बुद्धाय!

  आज हम मिलिन्द प्रश्न ग्रंथ के मूल अध्याय को पढ़ेंगे। जैसा कि पिछले अध्यायों में हमने बताया कि मिलिन्द प्रश्न ग्रंथ का एक चीनी संस्करण भी है अतः चीनी संस्करण में दिए गए पूर्व योग और पाली संस्करण के पूर्व योग दोनों का उल्लेख इस भाग में किया जाएगा। परंतु सबसे पहले पाली ग्रंथ अनुसार पूर्व योग पढ़ते हैं।

  पूर्व योग का अर्थ है उनके पूर्व जन्म में किये गए कर्म। जैसा कि आप जानते हैं कि बौद्ध धम्म के त्रिपिटक ग्रंथों में पूर्व जन्म का उल्लेख किया गया है और जातक कथाएं भी भगवान गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाओं पर आधारित है। अतः ये कहा जाना कि पूर्व जन्म और कर्मो के फल जैसी कोई चीज नहीं होती गलत ही होगा। पूर्व योग में मिनांडर और भन्ते नागसेन जी के पूर्व जन्म की कथा का वर्णन मिलता है। उस समय वे भगवान काश्यप बुद्ध के शासन काल में पृथ्वी पर मानव योनि में जन्म लिए थे। भगवान काश्यप बुद्ध के शासन काल में गंगा नदी के समीप, एक आश्रम में, एक बड़ा भिक्खु संघ रहता था।वहाँ व्रत और शील सम्पन्न भिक्खु रहा करते थे, जो कि प्रातः काल ही उठ कर अपने आश्रम में साफ सफाई कर बुद्ध के ज्ञान का ध्यान करते थे। एक दिन एक भिक्खु ने किसी श्रामणेर से कहा, "यहाँ आओ और इस कूड़े को फेंक दो।" परंतु वह श्रामणेर सुनते हुए भी उस भिक्खु की बात को अनसुना कर रहा था। जिस पर उस भिक्खु ने दूसरी और तीसरी बार फिर से उसे बुलाया पर वह श्रामणेर नहीं आया। ऐसे में भिक्खु को विचार आया कि "यह श्रामणेर बहुत ही अविनीत है" और फिर उस भिक्खु ने क्रुद्ध हो कर उस श्रामणेर को झाड़ू से मारा। तब उस श्रामणेर ने रोते हुए डर के मारे कूड़े को फेंकते हुए अपने मन मे पहला संकल्प किया कि "इस कूड़े को फेंकने के पुण्य-कर्म से जब तक मुझे निर्वाण पद प्राप्त नहीं होता तब तक मैं यह कार्य करता रहूंगा और जितना पुण्य मैं ग्रहण करूँ, दोपहर के सूर्य के समान तेजस्वी होऊँ।" कूड़े को फेंक कर श्रामणेर स्नान करने के लिए गंगा नदी के घाट पर गया, और वहाँ गंगा नदी की जलधारा को देख कर उसने दूसरा संकल्प किया, "जहाँ - जहाँ मैं जन्म ग्रहण करूँ इन जल तरंगों (जल धारा) के वेग के समान प्रत्युत्पन्नमति (कुशाग्र बुद्धि वाला) और प्रतिभाशाली होऊँ।"

  उसी समय उस भिक्खु ने श्रामणेर के द्वारा किये गए दोनों संकल्पों को सुना और सुन कर मन में विचार किया, "यह श्रामणेर मुझ से प्रेरित होने पर यदि ऐसा संकल्प करता है, तो क्या मुझे इसका फल प्राप्त नहीं होगा?" ऐसा विचार कर भिक्खु ने भी संकल्प किया, "जहाँ - जहाँ मैं जन्म ग्रहण करूँ इन जल तरंगों (जल धारा) के वेग के समान प्रत्युत्पन्नमति (कुशाग्र बुद्धि वाला) और इस श्रामणेर के पूछे सभी प्रश्नों की गुत्थियों को सुलझाने में मैं समर्थ होऊँ।"

तब दोनों ने देवलोक और मनुष्य लोक में अलग - अलग जन्म ग्रहण करते हुए एक बुद्धन्तर बिता दिया। (एक बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद से दूसरे बुद्ध के होने तक कि अवधि को "बुद्धन्तर" कहा जाता है।) तब तथागत बुद्ध के समय भी भगवान बुद्ध ने उन दोनों को देख और मोग्गली-पुत्त तिस्स महाथेर के समान उनके विषय में भी भविष्यवाणी की - "मेरे महापरिनिर्वाण के पाँच सौ वर्ष पश्चात ये दोनों जन्म ग्रहण करेंगे और जिस धर्म विनय का मैंने सूक्ष्म रूप से उपदेश दिया है उसे ये प्रश्नोत्तरों, उपमाओं और युक्तियों से स्पष्ट कर देंगे।"

उनमें से वह श्रामणेर जम्बूद्वीप के सागल नामक नगर में मिलिन्द नाम का राजा हुआ। वह बहुत ही विद्वान, चतुर, बुद्धिमान और समर्थ शासक था। उसने अनेक विद्याओं का अध्ययन किया था, जैसे - श्रुति, स्मृति, सांख्य योग, न्याय, वैशेषिक, गणित, संगीत,वैद्यक,चारों वेद,सभी पुराण, इतिहास, ज्योतिष, मंत्र विद्या, तर्क, तंत्र, युद्ध विद्या, छंद और सामुद्रिक शास्त्र जैसे 19 विद्याओं में वह पारंगत था। वह सभी तीर्थंकरों में श्रेष्ठ समझा जाता था। (उस समय भिन्न-भिन्न मतों को चलाने वाले अनेक आचार्य थे, और सभी आचार्यों का मत एक दूसरे से बिल्कुल ही अलग था। ये आचार्य अपने शिष्यों की बड़ी-बड़ी मण्डली के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमा करते थे। इन्हीं को तीर्थंकर कहते थे।)


पूर्व योग का चीनी संस्करण (संक्षेप विवरण) :

एक समय भगवान बुद्ध सावत्थि (श्रावस्ती) में विहार करते थे, भिक्खु - भिक्खुणीयों तथा उपासक-उपासिकाओं से दिन-रात घिरे रहने के कारण उनके मन में आया कि कुछ दिन एकांतवास करता हूँ। तब वे सभी को छोड़ एकांतवास के लिए पारिलेय्य नामक वन में जा कर एक बरगद के वृक्ष के नीचे ध्यान मग्न हो बैठ गए।

वहीं पास में एक दूसरे जंगल में एक हस्तिराज (हाथियों का मुखिया हाथी) अपने 500 हाथियों के साथ वास करता था।हस्तिराज भी समुदाय के जीवन से ऊब कर अपने सभी अनुचरों को छोड़ कर उसी जंगल में जहाँ भगवान बुद्ध ठहरे थे वहाँ पहुंचा। तथागत ने हस्तिराज को प्रेमपूर्वक अपने निकट बुलाया। उसके पश्चात से ही हस्तिराज बहुत दिनों तक तथागत की नित प्रतिदिन सेवा करने लगे। जब तथागत बुद्ध वहां से प्रस्थान किया तो हस्तिराज को बहुत दुख हुआ। वे दिन प्रतिदिन भगवान को जीवनपर्यंत याद करने लगे। दूसरे जन्म में वे एक ब्राम्हण के घर उत्पन्न हुए। बड़े होने पर उन्हें वैराग्य हो आया और वे संन्यास ग्रहण कर किसी पहाड़ पर रहने लगे। उसी पहाड़ पर एक दूसरा सन्यासी भी रहता था, वे दोनों सन्यासी आपस में बहुत घनिष्ठ मित्र बन गए। एक दिन उन्होंने दूसरे सन्यासी से कहा, “भाई, संसार बड़ा दोष-पूर्ण है, इसमें दुख ही दुख व्याप्त है। इसी से निर्वाण पाने के लिए मैं ने सन्यास लिया है और ब्रह्मचर्य (वीतकाम) का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।” तब दूसरे सन्यासी ने कहा, “नहीं, मैं तो यह सन्यासी जीवन इसलिए व्यतीत कर रहा हूँ, जिससे कि अगले जन्म में इस पुण्य के कारण लोक-विजयी अधिराज (दुनिया को विजय करने वाला राजा) बन सकूँ हो। मेरी यही कामना है”।

अगले जन्म में उनमें से एक समुद्र के किनारे बी 'नन” (मिलिन्द) नाम का राजकुमार हुआ । दूसरा “की पिन कुन्‌” प्रदेश में उत्पन्न हुआ । पूर्वजन्म में निर्वाण पाने की प्रबल इच्छा होने के कारण "बच्चा” ऐसा मालूम पड़ता था, मानो 'काषाय' पहने हो। उसके उत्पन्न होने के दिन ही उस स्थान पर एक हथनी को भी एक बच्चा पैदा हुआ था, चूँकि हाथी को "नाग" भी कहा जाता है इसी कारण से उस बच्चे का नाम "नागसेन" पड़ा।

नागसेन के मामा "लोहन" बड़े सिद्ध भिक्खु थे। बालक नागसेन लोहन के साथ रह के धर्म का अध्ययन करने लगे। नागसेन की बुद्धि बड़ी तेज थी जिसके कारण उन्होंने अपना अध्ययन बहुत जल्द ही समाप्त कर लिया और बीस वर्ष की आयु में "हो सेन" नामक विहार में उनकी उपसम्पदा हुई। जिसके पश्चात भिक्खु नागसेन निर्वाण प्राप्ति का दृढ़ निश्चय कर निकल पड़े।

(शेष पूर्वयोग पाली संस्करण जैसा है, सभी प्रश्नोत्तर, उपमाएं एवं भाषा भी पाली संस्करण के समान ही है।)

इसके पश्चात राजा मिलिन्द की तत्कालीन विद्वानों से भेंट और उनके बीच हुए सामान्य प्रश्नों के संबंध की कथा आप अगले संस्करण में पढ़ेंगे। 

भवतु सब्ब मंगलं।

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