बौद्ध धर्म में उत्तम व्यक्ति की व्याख्या (Anaṅgaṇa Sutta)
नमो बुद्धाय! सभी उपासक एवं उपसिकाओं को मेरा नमस्कार। दोस्तों! बौद्ध धम्म के अनुसार इस लोक (संसार) में चार तरह (प्रकार) के व्यक्ति होते हैं। कौन से चार? पहला, वह व्यक्ति होता है जो अपने चित्त में मल सहित होता हुआ भी यह ठीक से नहीं जानता कि उसके चित्त में मल ( राग, द्वेष, मोह , ये तीन प्रकार के चित्तमल अथवा अंगण) है। दूसरा, वह व्यक्ति होता है, जो अपने चित्त में मल होने पर जानता है कि उसके चित्त में मल है। तीसरा, वह व्यक्ति होता है, जिसका चित्त निर्मल होता है पर वह नहीं जानता कि वह निर्मल चित्त वाला है। चौथा, वह व्यक्ति है, जिसका चित्त निर्मल होता है और वह यह बात अच्छी तरह से जानता है कि उसका चित्त पूर्णतः निर्मल है। इन चारों तरह के व्यक्तियों में पहले दो व्यक्तियों जिनके चित्त में मल है, में से जो व्यक्ति यह ठीक से नहीं जानता कि उसके चित्त में मल है वह उन दोनों तरह के व्यक्तियों में हीन माना जाता है, क्योंकि जब उसे ठीक से पता ही न होगा कि उसके चित्त में मल है तो वह अपने चित्त को परिशुद्ध करने का कोई प्रयास ही नहीं करेगा और ऐसे में वह राग-युक्त, द्वेष युक्त और मोह ...