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Showing posts from 2023

मिलिन्द प्रश्न : बालक नागसेन और आयुष्मान रोहण की भेंट

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नमो बुद्धाय! बालक नागसेन अपनी शिक्षा को ध्यान अवस्था में विचारने लगे, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि न आदि में, न माध्यम में और न ही अवसान में इस शिक्षा का कोई भी सार नहीं है, जिससे उसे बहुत असंतुष्टि हुई। तब उस के मन में आया कि "ये वेद तुच्छ हैं, खोखले हैं। उनमें न कोई सार है न कोई अर्थ है और न कोई तथ्य है।" तब अपने ध्यान बल से आयुष्मान रोहण को बालक नागसेन के  चित्त को जान कर आयुष्मान रोहण बालक नागसेन जहाँ थे उस गांव में पहुँचे। बालक नागसेन ने अपने घर के दरवाजे पर खड़े-खड़े आयुष्मान रोहण को दूर ही से आते देखा । उन्हें देख कर वह बहुत संतुष्ट, प्रमुदित और प्रीतियुक्त हो उठा। यह विचार कर कि शायद यह भिक्षु कुछ सार जानता होगा, वह उनके पास गया और बोला--"मारिस ! इस तरह सिर मुड़ाये और काषाय वस्त्र धारण किये आप कौन हें ?” "बालक! मैं भिक्षु हूँ" "मारिस! आप भिक्षु क्यों बने?" "पापरूपी मलों को दूर करने के लिये मैं भिक्षु हुआ हूँ।" "मारिस! क्‍या कारण है कि आप के केश वैसे नहीं हैं, जैसे दूसरे लोगों के होते हैं?" "उनमें सोलह बाधायें देखकर, भिक्षु सि...

मिलिन्द प्रश्न : भन्ते नागसेन का जन्म

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नमो बुद्धाय! पिछले अध्याय में हमने पढ़ा था कि देवपुत्र महासेन को आयुष्मान अस्सगुत्त और अन्य देवताओं एवं भिक्खुओं के द्वारा मनुष्य लोक में जन्म हेतु आग्रह किया गया और भिक्खु संघ की बैठक में शामिल न होने पर आयुष्मान रोहण को बालक नागसेन की प्रव्रज्या तक के लिए दण्ड कर्म का आदेश दिया गया था।  फिर आयुष्मान रोहण दण्ड कर्म आदेश अनुसार हिमालय पर्वत के पास के कजंगल गांव में गए और दण्ड कर्म अनुसार प्रतिदिन सोनुत्तर ब्राम्हण के घर पर  भिक्षाटन के लिए जाने लगे। शुरुआत में कई वर्षों तक उन्हें ब्राम्हण के घर से कोई भिक्षाटन प्राप्त नहीं हुआ और न ही किसी ने "आगे जाओ" ऐसे शब्द कह कर उन्हें बोला।  दस माह बीतने पर ब्राम्हण के घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम नागसेन रखा गया। धीरे - धीरे वह बालक 7 वर्ष का हो गया। तब उसके पिता ने उसे कहा, " प्रिय नागसेन! इस ब्राम्हण कुल की जो शिक्षाएं हैं तुम्हें उन्हें सीखना चाहिए।" बालक नागसेन ने कहा, "तात! इस ब्राम्हण कुल की कौन सी शिक्षाएं हैं?" "प्रिय नागसेन! तीनों वेद और दूसरे शिल्प - ये ही शिक्षाएं हैं।" "तात! मैं सभी शि...

मिलिन्द प्रश्न : राजा मिलिन्द की भेंट

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  नमो बुद्धाय! मित्रों! पिछले भाग में हमने राजा मिलिन्द और भन्ते नागसेन के पूर्व जन्म की गाथा को पढ़ा था। अब हम राजा मिलिन्द, जो कि विद्या व्यसनी था और अपनी ज्ञान पिपासा को मिटाने हेतु हमेशा आतुर रहता था, की तत्कालीन विद्वान व्यक्तियों से भेंट की गाथा सुनेंगे। कहा जाता है कि राजा मिलिन्द के पास अनंत सेना थी, अतः एक दिन राजा मिलिन्द अपनी चतुरंगिणी अनन्त सेना को देखने के अभिप्राय से नगर के बाहर गया। सेनाओं की गणना करने के बाद उस वाद-प्रिय राजा ने लोकायत और वितण्डवादियों (इनके मतानुसार स्वर्ग और नर्क कुछ नहीं होता है, ये पूर्णतः यथार्थवादी थे, ये संसार को ही सब कुछ मानते थे। इनके किसी भी बात का प्रत्यक्ष प्रमाण ही एक मात्र प्रमाण होता था) से तर्क करने की उत्सुकता से ऊपर सूर्य की ओर देखा, और अपने अमात्यों (मंत्रियों) को सम्बोधित किया- "अभी बहुत दिन बाकी है। तब तक क्‍या करना चाहिये?क्‍या ऐसा कोई पण्डित सम्यक्‌ - सम्बुद्ध के सिद्धान्तों को जानने वाला श्रमण, ब्राह्मण या गणाचार्य है, जिसके साथ में नगर में जाकर वार्तालाप करूँ, जो मेरी शंकाओं को दूर कर सके ?” राजा के द्वारा ऐसा कहने पर पाँच ...

मिलिन्द प्रश्न : पूर्व योग

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नमो बुद्धाय!   आज हम मिलिन्द प्रश्न ग्रंथ के मूल अध्याय को पढ़ेंगे। जैसा कि पिछले अध्यायों में हमने बताया कि मिलिन्द प्रश्न ग्रंथ का एक चीनी संस्करण भी है अतः चीनी संस्करण में दिए गए पूर्व योग और पाली संस्करण के पूर्व योग दोनों का उल्लेख इस भाग में किया जाएगा। परंतु सबसे पहले पाली ग्रंथ अनुसार पूर्व योग पढ़ते हैं।   पूर्व योग का अर्थ है उनके पूर्व जन्म में किये गए कर्म। जैसा कि आप जानते हैं कि बौद्ध धम्म के त्रिपिटक ग्रंथों में पूर्व जन्म का उल्लेख किया गया है और जातक कथाएं भी भगवान गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाओं पर आधारित है। अतः ये कहा जाना कि पूर्व जन्म और कर्मो के फल जैसी कोई चीज नहीं होती गलत ही होगा। पूर्व योग में मिनांडर और भन्ते नागसेन जी के पूर्व जन्म की कथा का वर्णन मिलता है। उस समय वे भगवान काश्यप बुद्ध के शासन काल में पृथ्वी पर मानव योनि में जन्म लिए थे। भगवान काश्यप बुद्ध के शासन काल में गंगा नदी के समीप, एक आश्रम में, एक बड़ा भिक्खु संघ रहता था।वहाँ व्रत और शील सम्पन्न भिक्खु रहा करते थे, जो कि प्रातः काल ही उठ कर अपने आश्रम में साफ सफाई कर बुद्ध के ज्ञान का ध्...

मिलिन्द प्रश्न : (प्रस्तावना भाग 2)

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  नमो बुद्धाय! पिछले भाग में हमने जाना था कि राजा मिनांडर उर्फ मिलिन्द कितना बड़ा विद्या व्यसनी था, उसने तत्कालीन सभी ग्रंथों जैसे कि वेद, पुराण, दर्शन इत्यादि सभी विद्याओं का अध्ययन किया था। जिस कारण से वह दार्शनिक वाद-विवाद एवं शास्रार्थ करने में बहुत निपुण हो गया था। यहां तक कि उस समय के बड़े-बड़े दिग्गज पण्डित एवं विद्वान लोग भी उससे शास्रार्थ करने में भय मानते थे। राजा मिलिन्द की ज्ञान पिपासा को भिक्खु नागसेन के द्वारा दिये गए उपदेशात्मक उत्तरों से शांत किया। और उसी वादविवाद के फलस्वरूप हम इस ग्रंथ को पढ़ रहे हैं जिसका नाम मिलिन्द प्रश्न है। मिलिन्द प्रश्न ग्रन्थ को किसने लिखा, इसके बारे में ग्रंथ में कहीं भी उल्लेख नहीं है। और न ही कोई भी विद्वान इस बारे में पता लगा पाया है। पाली के अतिरिक्त मिलिन्द प्रश्न का एक दूसरा संस्करण चीनी भाषा में भी मिलता है। चीनी भाषा में उक्त संस्करण का नाम "ना-से-पि-ब्कु-किन्" है, जिसका अर्थ है - "नागसेन-भिक्खु-सुत्त"। भन्ते जगदीश काश्यप जी ने उक्त पुस्तक का एक चीनी पंडित की मदद से अंग्रेजी में अनुवाद किया है। चीनी संस्करण और पाली संस...

मिलिन्द प्रश्न (प्रस्तावना भाग 1)

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नमो बुद्धाय! बौद्ध ग्रंथों में "मिलिन्द प्रश्न" नामक ग्रंथ अपना एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चूँकि "मिलिन्द प्रश्न ग्रंथ की गिनती त्रिपिटक के ग्रंथों में नहीं की जाती, परंतु त्रिपिटक के बाद लिखे जाने वाले बौद्ध ग्रंथों में इसकी महत्वता को कम नहीं समझा जा सकता। जिस प्रकार हिन्दू धर्म के ग्रंथों में श्रीमद्भागवत गीता का एक अतुल्य स्थान है और गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन की विभिन्न शंकाओं का समाधान करने के लिए उपदेशात्मक उत्तर दिए हैं उसी तरह मिलिन्द प्रश्न में सम्राट मिलिन्द (मिनांडर) के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का, शंकाओं का समाधान भिक्खु नागसेन के द्वारा किया गया है। ईसा से 326 वर्ष पूर्व यूनानी सम्राट सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था, परंतु उसकी सेना मगध की विशाल सेना का सामना न कर पायी और उसे वापस लौटना पड़ा। सिकंदर के कुछ साथी पश्चिमी एशिया में बस गए, और इस प्रकार भारत में यूनानियों का आकर बस जाना जारी रहा। ईसा से 150 वर्ष पूर्व भारत के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में सागल या शाकल नामक देश था, जिस पर यूनानी राजा मिनांडर का शासन था। मिनांडर एक यूनानी नाम है जिसका हिंद...

मिलिन्द पन्ह : पुस्तक समीक्षा

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मन भटक - भटक जाए  पर बुद्ध की शरण में हर बार लौट आये कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा है आजकल, मन बार - बार भटक जा रहा है, पर फिर भी एक राह ऐसी है, जो हमेशा से ही अपने द्वार खोले हुई है और वह राह भगवान तथागत बुद्ध के धम्म की राह है। कई दिनों से काफी अलग - अलग तरह की किताबें पढ़ने की कोशिश कर रहा था, पर पता नहीं क्यों उन किताबों में आत्म संतुष्टि नहीं मिल रही थी। कुछ अच्छा सीखने की चाह शुरुआत और अंत में विचारों पर संयम रखने की सलाह देती है, और लगभग हर मोटिवेशनल किताब में लेखक ने इसी सिद्धांत को अपने-अपने तरीके से दोहराया है। जिसे आज से लगभग 2600 साल पहले तथागत बुद्ध ने दुनिया को बताया था। इसी राह पर मैंने पिछले दिनों बौद्ध धम्म की एक अमूल्य पुस्तक "मिलिन्द पन्ह", जिसका अनुवाद पूजनीय भिक्खु जगदीश काश्यप जी ने किया है, पढ़ना आरम्भ किया है। किताब में आपको ऐसे छोटे-छोटे से प्रश्न जो कभी आपके मन में जरूर उठते होंगे उनका भी सटीक वर्णन किया गया है। जैसा कि हम जानते हैं कि आज कल बौद्ध धम्म अनुयायियों द्वारा स्वर्ग-नर्क, पुनर्जन्म, इंद्र, ब्रम्हा इत्यादि विषयों पर विश्वास करने से मना कर दिया जाता...

"आत्मा" अमर है.. अनात्मवाद की दृष्टि से एक विश्लेषणात्मक चिंतन

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"आत्मा" अमर है.. अनात्मवाद की दृष्टि से एक विश्लेषणात्मक चिंतन.. ये जो "मैं" है, मुझमें है, तुम में है, और हम सभी में है "अलग - अलग", पर एक ही है। और अगर आप विचार करो, चिंतन या मनन करो तो पाओगे कि ये जो "मैं" है, वो अजन्मा है वो कब मुझमें जन्मा, मुझे भी नहीं पता वो कब तुम में जन्मा, तुम्हे भी नहीं पता। पर ये मुझमें मेरे जन्म के साथ है, शायद जन्म से पहले भी था और शायद मृत्यु के बाद भी। इस "मैं" कि मृत्यु नहीं हो सकती, क्योंकि मेरे या तुम्हारे शरीर की मृत्यु के बाद भी ये मैं, किसी न किसी शरीर में जीवित ही रहेगा। ये मर नहीं सकता, ये अमर है। और इसीलिए मैं कहता हूं कि ये "मैं" ही "आत्मा" है।  ये जो मेरा वजूद है, मेरे शरीर तक ही है, पर मेरे "मैं" का वजूद, मेरे शरीर के बाद किसी न किसी अन्य रूप में, किसी न किसी अन्य शरीर में ज़िंदा रहेगा।  मेरे "मैं" को मैं भी तब तक नहीं मार सकता, जब तक मैं इस "मैं" का अस्तित्व ही झुठला न दूँ, जब तक इस "मैं" को मानना ही न छोड़ दूं। तथागत बुद्ध ने भी यही ...